Saturday, August 10, 2013

विश्व नियंता के दरवाजे , कभी ना जाएँ , मेरे गीत !

सब कहते, ईश्वर लिखते ,
है,भाग्य सभी इंसानों का !
माता पिता छीन बच्चों से
चित्र बिगाड़ें, बचपन का !
कभी मान्यता दे न सकेंगे, निर्मम रब को, मेरे गीत !
मंदिर,मस्जिद,चर्च न जाते, सर न झुकाएं मेरे गीत ! १०

बचपन से,ही रहे खोजता 
ऐसे , निर्मम, साईं   को  !
काश कहीं मिल जाएँ मुझे
मैं करूँ निरुत्तर,माधव को !
अब न कोई वरदान चाहिए,सिर्फ शिकायत मेरे मीत !
विश्व नियंता के दरवाजे , कभी न जाएँ , मेरे गीत ! 

क्यों तकलीफें  देते, उनको  ?
जिनको शब्द नहीं मिल पाए !
क्यों  दुधमुंहे, बिलखते रोते 
असमय,माँ से अलग कराये !
तड़प तड़प कर अम्मा खोजें,कौन सुनाये इनको गीत !
भूखे पेट , कांपते पैरों , ये  कैसे , गा  पायें   गीत   ?? 

जिनका,कोई नज़र न आये
सबसे , प्यारे  लगते  हैं   !
जिनसे सब कुछ छीन लिया 
हो,  वे अपने  से  लगते हैं  !
कभी समझ न आया मेरे, कष्ट दिलाएंगे जगदीश !
सारे जीवन सर न झुकाएं, काफिर होते मेरे गीत  !

जैसी करनी, वैसी   भरनी !
पंडित , खूब  सुनाते आये !
पर  नन्हे  हाथों की करनी
पर,मुझको विश्वास न आये
तेरे महलों क्यों न पंहुचती ईश्वर, मासूमों की चीख !
क्षमा करें,यदि चढ़ा न पायें, अर्ध्य, देव को,मेरे गीत !

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