Sunday, December 21, 2014

भीड़तंत्र की लोकतंत्र में हँसी उड़ाएं मेरे गीत -सतीश सक्सेना

आग लगाई संस्कारों में 
सारी शिक्षा भुला गुरु की
दाढ़ी तिलक लगाये देखो  
महिमा गाते हैं,रावण की !
डर की खेती करते,जीते नफरत फैला,निर्मम गीत !
करें दंडवत महलों जाकर,बड़े महत्वाकांक्षी गीत !

खद्दर पहने नेतागण अब
लेके चलते , भूखे खप्पर,
इन पर श्रद्धा कर के बैठे
जाने कब से टूटे छप्पर !
टुकुर टुकुर कर इनके मुंह को,रहे ताकते निर्बल गीत !
कौन उठाये  नज़रें अपनी , इनके टुकड़े खाके  गीत !

धन कुबेर और गुंडे पाले 
जितना बड़ा दबंग रहा है
अपने अपने कार्यक्षेत्र में 
उतना ही सिरमौर रहा है 
भेंड़ बकरियों जैसी जनता,डरकर इन्हें दिलाती जीत !
पलक झपकते,ही बन जाते सत्ताधारी,घटिया गीत !

जनता इनके पाँव  चूमती
रोज सुबह दरवाजे जाकर
किसमें दम है आँख मिलाये 
बाहुबली के सम्मुख आकर  
हर बस्ती के गुंडे आकर चारण बनकर ,गाते गीत !
हाथ लगाके इन पैरों को,जीवन धन्य बनाते गीत !

लोकतंत्र के , दरवाजे पर 
हर धनवान जीतकर आया
हर गुंडे को पंख लग गए 
जब उसने मंत्री पद पाया
अनपढ़ जन से वोट मांगने,बोतल लेके मिलते मीत !
बिका मीडिया हर दम गाये, अपने नेताओं के गीत !

निर्दोषों की हत्या वाले  
डाकू को,साधू बतलाएं 
लच्छे दारी बातों वाले 
ठग्गू को विद्वान बताएं
लम्बी दाढ़ी, भगवा कपडे, भीड़ जुटाकर गायें गीत !
टेलीविज़न के बलबूते पर,जगतगुरु बन जाते गीत !

खादी कुरता, गांधी टोपी,
में कैसे  दमदार बन गये  !
चालाकी मक्कारी के बल 
मूर्खों के  सरदार बन गये !
वोट बटोरे झोली भरभर, देशभक्ति के बनें प्रतीक ! 
राष्ट्रप्रेम भावना बेंचकर,अरबपति बन जाएँ गीत !

Monday, June 02, 2014

दुनियां वाले कैसे समझें , अग्निशिखा सम्मोहन गीत -सतीश सक्सेना

कलियों ने अक्सर बेचारे
भौंरे  को बदनाम किया !
खूब खेल खेले थे फिर भी  
मौका पा अपमान किया !
किसने शोषण किया अकेले,  
किसने फुसलाये थे गीत !
किसको बोलें,कौन सुनेगा,कहाँ से हिम्मत लाएं गीत !

अक्सर भोली ही कहलाये
ये सजधज के रहने वाली !
मगर मनोहर सुंदरता में 
कमजोरी , रहती हैं सारी !
केवल भंवरा ही सुन पाये, 
वे  धीमे आवाहन  गीत !
दुनियां वाले कैसे समझें, कलियों के सम्मोहन गीत !


नारी से आकर्षित  होकर
पुरुषों ने जीवन पाया है !
कंगन चूड़ी को पहनाकर
मानव ने मधुबन पाया है !
मगर मानवी समझ न पायी, 
कर्कश,निठुर, खुरदुरे गीत !
अधिपति दीवारों का बनके , जीत के हारे पौरुष गीत !

स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः
शक्तिः एवं सामर्थ्य-निहितः 
व्यग्रस्वभावः , सदा मनुष्यः !
इसी शक्ति की कर्कशता में, 
दच्युत रहते पौरुष गीत !
रक्षण पोषण करते फिर भी, निन्दित होते मानव गीत !

निर्बल होने के कारण ही 
हीन भावना मन में आयी 
सुंदरता  आकर्षक  होकर  
ममता भूल, द्वेष ले आयी 
कड़वी भाषा औ गुस्से का 
गलत आकलन करते मीत ! 
धोखा  खाएं आकर्षण में , अपनी  जान गवाएं गीत !

दीपशिखा में चमक मनोहर
आवाहन  कर, पास बुलाये !
भूखा प्यासा , मूर्ख  पतंगा , 
कहाँ पे आके, प्यास  बुझाये  ! 
शीतल छाया भूले घर की,
कहाँ सुनाये जाकर गीत !  
जीवन कैसे आहुति देते , कैसे जलते  परिणय गीत !

Friday, January 10, 2014

मानवता खतरे में पाकर, चिंतित रहते मानव गीत -सतीश सक्सेना

हम तो केवल हंसना चाहें 
सबको ही, अपनाना चाहें 
मुट्ठी भर जीवन  पाए  हैं 
हंसकर इसे बिताना चाहें 
खंड खंड संसार बंटा है , 
सबके अपने अपने गीत ।  
देश नियम,निषेध बंधन में,क्यों बांधा जाए संगीत ।  

नदियाँ,झीलें,जंगल,पर्वत
हमने लड़कर बाँट लिए।  
पैर जहाँ पड़ गए हमारे ,
टुकड़े,टुकड़े बाँट लिए।  
मिलके साथ न रहना जाने,
गा न सकें,सामूहिक गीत ।  
अगर बस चले तो हम बांटे,चांदनी रातें, मंजुल गीत । 

कितना सुंदर सपना होता 
पूरा विश्व  हमारा  होता । 
मंदिर मस्जिद प्यारे होते 
सारे  धर्म , हमारे  होते ।  
कैसे बंटे,मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत । 
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।  

काश हमारे ही जीवन में 
पूरा विश्व , एक हो जाए । 
इक दूजे के साथ  बैठकर,
बिना लड़े,भोजन कर पायें ।
विश्वबन्धु,भावना जगाने, 
घर से निकले मेरे गीत । 
एक दिवस जग अपना होगा,सपना देखें मेरे गीत । 

जहाँ दिल करे,वहां रहेंगे 
जहाँ स्वाद हो,वो खायेंगे ।
काले,पीले,गोरे मिलकर  
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे । 
तोड़ के दीवारें देशों की, 
सब मिल गायें  मानव गीत । 
मन से हम आवाहन करते, विश्व बंधु बन, गायें गीत । 

श्रेष्ठ योनि में, मानव जन्में  
भाषा कैसे समझ न पाए । 
मूक जानवर प्रेम समझते  
हम कैसे पहचान न पाए । 
अंतःकरण समझ औरों का,
सबसे करनी होगी प्रीत ।  
माँ से जन्में,धरा ने पाला, विश्वनिवासी बनते गीत ?

सारी शक्ति लगा देते हैं  
अपनी सीमा की रक्षा में, 
सारे साधन, झोंक रहे हैं
इक दूजे को,धमकाने में,
अविश्वास को दूर भगाने,
सब मिल गायें मानव गीत ।  
मानव कितने गिरे विश्व में, आपस में रहते भयभीत । 

जानवरों के सारे अवगुण 
हम सबके अन्दर बसते हैं । 
सभ्य और विकसित लोगों
में,शोषण के कीड़े बसते हैं । 
मानस जब तक बदल न 
पाए,कैसे कहते उन्नत गीत ।    
ताकतवर मानव के भय की,खुलकर हँसी उड़ायें गीत । 

मानव में भारी  असुरक्षा 
संवेदन मन,  क्षीण  करे । 
भौतिक सुख,चिंता,कुंठाएं   
मानवता  का  पतन करें ।  
रक्षित कर,भंगुर जीवन को, 
ठंडी साँसें  लेते  मीत  ।  
खाई शोषित और शोषक में, बढती देखें मेरे गीत ।  

अगर प्रेम,ज़ज्बात हटा दें 
कुछ न बचेगा  मानव में । 
बिना सहानुभूति जीवन में
क्या रह जाए, मानव में ।
पशुओं जैसी मनोवृत्ति से, 
क्या प्रभाव डालेंगे गीत !  
मानवता खतरे में  पाकर, चिंतित रहते मानव गीत । 

भेदभाव की बलि चढ़ जाए 
सारे राष्ट्र साथ मिल  जाएँ, 
तनमनधन न्योछावर करके  
बच्चों से निश्छल बन जाएँ , 
बे हिसाब रक्षा धन, बाँटें, 
दुखियारों में, बन के मीत ।
प्रतिद्वंदिता त्यागकर इक दिन साथ रहेंगे बैरी गीत !

Sunday, August 25, 2013

कौन किसे सम्मानित करता,खूब जानते मेरे गीत -सतीश सक्सेना

अक्सर अपने ही कामों से 
हम अपनी पहचान कराते 
नस्लें अपने खानदान की 
आते जाते खुद कह जाते ! 
चेहरे पर मुस्कान, ह्रदय से गाली देते, अक्सर मीत !
कौन किसे सम्मानित करता,खूब जानते मेरे गीत !

सरस्वती को ठोकर मारें 
ये कमज़ोर लेखनी वाले !
डमरू बजते भागे ,आयें   
पुरस्कार को लेने वाले  !
बेईमानी छिप न सकेगी,आशय खूब समझते गीत !
हुल्लड़ , हंगामे पैदा कर , नाम कमायें ऐसे  गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले 

पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी  
प्रतिभा नाक रगडती पाये  !
अभिलाषाएं छिप न सकेंगी,इच्छा बनें यशस्वी गीत !
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना , पुरस्कार हथियाते  गीत !

लार टपकती देख ज्ञान की 

कुछ राजे,  मुस्काते आये  !
मुट्ठी भर , ईनाम फेंकते 
पंडित  गुणी , लूटने  धाएं  ! 
देख दुर्दशा आचार्यों की , सर धुन रोते , मेरे गीत  ! 
दबी हुई,राजा बनने की इच्छा,खूब  समझते  गीत !

चारण,भांड हमेशा रचते 
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी 
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे,जीवन भर हम,खूब सुनाये  स्तुति  गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में,फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

हिंदी  का  अपमान कराएं 

लेखक खुद को कहने वाले 
रीति रिवाज़ समझ न पायें 
लोक गीत को, रचने वाले 
कविता का उपहास बनाएं ,करें प्रकाशित घटिया गीत !
गली गली में ज्ञानी लिखते , अपनी कविता, अपने गीत !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर 
हिंदी के मार्तंड कहाये !
कुर्सी पायी है किस्मत से  
सुरा सुंदरी,भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र को पाकर , हंसी उड़ायें मेरे गीत !
भाषा औ साहित्य भून कर, भोग लगाएं मेरे गीत !

इनके आशीर्वाद से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे !
इनके एक वरदान से आता 
आसमान , चरणों में जैसे  !
सिगरट और स्कॉच पी रहे, साकी के संग बैठे मीत  !
पाण्डुलिपि पर छिडकें दारु , मोहित होते  मेरे गीत  !

कविता,गद्य,छंद,ग़ज़लों पर ,
कब्ज़ा कर , लहरायें  झंडा !
सुंदर शोभित नाम रख लिए 
ऐंठ  के  चलते , लेकर डंडा !
भीड़ देख , इन आचार्यों  की , आतंकित  हैं, मेरे गीत  !
कहाँ गुरु को ढूंढें जाकर , कौन  सुधारे  आकर  गीत ! 

Saturday, August 10, 2013

पद्मनाभ की स्तुति करते ,आहुति देते मेरे गीत !

कौन हवन को पूरा करने
कमल, अष्टदल लाएगा ?
अक्षत पुष्प हाथ में लेकर
कौन साथ में  गायेगा  ?
यज्ञ अग्नि में समिधा देने,कहीं से आयें मेरे मीत !
पद्मनाभ की, स्तुति करते ,आहुति देते मेरे गीत !

तुम्हें देखकर ही लिखने को 
सबसे पहले कलम उठायी !
तुम्हें देखकर ही पहले दिन
जाने क्यों लिख गयी रुबाई !
यार तुम्हारी यादों से ही, बार बार रच जाते गीत !
सिर्फ तुम्हारी ही गलियों में,धूम मचाने जाते गीत !

कितनी बार पुरानी यादें
अक्सर चुभती रहती हैं !
बिना कहे भी,कुछ बातें 
कानों में सुनाई पड़ती हैं !
बार बार वो नाम जुबा पर,लाएं क्यों दीवाने गीत !
कभी न बापस आयेंगे क्षण,चाहें कितने तड़पें गीत !

क्या बतलाये कैसे भूला  
बीते युग की, यादों को !  
जैसे तैसे भुला सका था
अपनी कड़वीं रातों को !
फिर मेरे द्वार पर आकर, क्यों मुस्काए तेरी प्रीत !
समझ न आये मुझको लेकिन,आभारी हैं मेरे गीत !

कैसे दिन बीते, मेरे बिन
आँखों आँखों पूंछ लिया !
कभी याद भी आयी मेरी 
बिना कहे ही जान लिया !
चाहा था पर पूंछ न पाया, कभी पढ़े हैं मेरे गीत  ?
याद तो मेरी आयी होगी,जब जब देखे होंगे मीत !

जबसे तुमने गीत न गाये ,
तब से पीर और भर आई !
भरी दुपहरी, रूठ गयी हो ,
जैसे पाहुन से, अमराई !
सुबह सबेरे, देख द्वार पर, भौचक्के हैं , मेरे गीत !
चेहरे पर मुस्कान देख कर,ढोल बजाते मेरे गीत ! 

रोज रात में कहाँ से आती
मुझे सुलाने, त्यागमयी !
साधारण रंग रूप तुम्हारा
हो कितनी आनंदमयी  ?
बिन तेरे क्यों नींद न आये,तुम्ही बताओ,मेरे मीत !
आहट पा, रजनीगंधा की , लगें नाचने , मेरे गीत  ! 

मैंने कब बुलवाया तुमको

अपने जख्म दिखाने को !
किसने अपना दर्द बांटना ,
चाहा , मस्त हवाओं को !
मुझे तुम्हारे न मिलने से, नहीं शिकायत मेरे मीत !
जब भी याद सुगन्धित होती, चित्र बनाते मेरे गीत ! 

कभी याद आती है मुझको

उन रंगीन फिजाओं की !
तभी याद आ जाती मुझको
उन सुरमई निगाहों की !
प्रथम बार देखा था जिस दिन, ठगे रह गए मेरे गीत !
जैसे तुमने नज़र मिलाई , मन गुदगुदी मचाएं गीत ! 

आज अकेला भौंरा देखा ,
धीमे धीमे, गाते देखा !
काले चेहरे और जोश पर
फूलों को, मुस्काते देखा !
खाते पीते केवल तेरी,याद दिलाएं ,ये मधु गीत !
झील भरी आँखों में कबसे,डूब चुके हैं ,मेरे गीत ! 

 रत्न जडित आभूषण पहने,

नज़र नहीं रुक पाती है !
क्या दे,तुझको भेंट सुदामा
मेरी व्यथा , सताती है !
रत्नमयी को क्या दे पाऊँ,बिछिया लाये, मेरे गीत !
अगर भेंट स्वीकार करो तो,धूम मचाएं, मेरे गीत ! 

कैसे बंजर में, जल लायें ?

हरियाली और पंछी आयें ?
श्रष्टि सृजन के लिए जरूरी,
गंगा , रेगिस्तान में लायें !
आग और पानी न होते , कैसे बनते , मेरे गीत !
तेरे मेरे युगल मिलन पर,सारी रात नाचते गीत ! 

अपने घर की तंग गली में !

मैंने कब चाहा बुलवाना ?
जवां उमर की उलझी लट को
मैंने कब चाहा, सुलझाना ?
मगर मानिनी आ ही गयी अब, चरण तुम्हारे ,धोते गीत !
स्वागत करते,निज किस्मत पर, मंद मंद मुस्काते गीत ! 

बिन बोले ही , बात करेंगे ,

बिना कहे ही,सब समझेंगे
आज निहारें, इक दूजे को,
नज़रों से ही , बात करेंगे !
ह्रदय पटल पर चित्र बनाएं , मौका पाते, मेरे गीत !
स्वप्नमयी को घर में पाकर ,आभारी हैं ,मेरे गीत ! 

कैसे बिना तुम्हारे, घर में

रचना का श्रंगार कर सकूं
रोली,अक्षत हाथ में लेकर
छंदों का सत्कार कर सकूं
कल्याणी स्वागत करने को,ढफली लेकर आये गीत !
सिर्फ तुम्हारे ही हाथों में,प्यार से सौंपे, अपने  गीत ! 

तेरी ऐसी याद कि मेरी हर

चिट्ठी, बन गयी कहानी !
जिसे, कलम ने तुझे याद कर
लिखा ,वही बन गयी रुबाई !
लगता जैसे महाकाव्य का,रूप ले रहे मेरे गीत !
धीरे धीरे, तेरे दिल में, जगह बनाएं मेरे गीत ! 

दर्द समझते मेरे गीत - सतीश सक्सेना

किसी कवि की रचना देखें,
दर्द छलकता,  दिखता है  !
प्यार, नेह दुर्लभ से लगते ,
शोक हर जगह मिलता है !
क्या शिक्षा विद्वानों को दें ,रचनाओं  में, रोते गीत !
निज रचनाएं,दर्पण मन की, दर्द समझते, मेरे गीत ! 

अपना दर्द किसे दिखलाते ?
सब हंसकर आनंद उठाते !
दर्द, वहीँ जाकर के बोलो ,
भूले जिनको,कसम उठाके !
स्वाभिमान का नाम न देना,बस अभिमान सिखाती रीत ,
अपना दर्द,  उजागर करते , मूरख  बनते  मेरे  गीत !

आत्म मुग्धता,  मानव की ,
कुछ काम न आये जीवन में !
गर्वित मन को समझा पाना ,
बड़ा कठिन, इस जीवन में !
जीवन की कड़वी बातों को, कहाँ भूल पाते हैं गीत !
हार और अपमान यादकर,क्रोध में आयें मेरे गीत !

जब भी कोई कलम उठाये 
अपनी व्यथा,सामने लाये ,
खूब छिपायें, जितना चाहें 
फिरभी दर्द नज़र आ जाये
मुरझाई यह हँसी, गा रही, चीख चीख, दर्दीले गीत !
अश्रु पोंछने तेरे,जग में, कहाँ मिलेंगे निश्छल गीत  ?

अहंकार की नाव में बैठे,
भूले  निज कर्तव्यों को 
अच्छी मीठी ,यादें भूले , 
संचित कडवे कष्टों को
कितने चले गए रो रोकर,कौन सम्हाले बुरा अतीत !
सब झूठें ,आंसू पोंछेंगे , कौन सुनाये , मंगल गीत  ?

सभी सांत्वना, देते आकर 
जहाँ लेखनी , रोती पाए !
आहत मानस, भी घायल 
हो सच्चाई पहचान न पाए !
ऎसी ज़ज्बाती ग़ज़लों को , ढूंढें अवसरवादी गीत !
मौकों का फायदा उठाने, दरवाजे पर तत्पर गीत !

इतना दर्द सुनाऊं किसको , कौन समझता मेरे गीत !

क्या खोया क्या पाया हमने ,
क्या छीना , इन नन्हों से !
क्यों न आज हम खुद से पूंछे
क्या पाया,  इन  राहों  से !
बचपन की मुरझाई आँखें, खूब रुलाये , हँसते  गीत !
देख सको तो, आँखें देखें ,अपने शिशु की, मेरे मीत !

अहम् हमारे ने,हमको तो
शक्ति दिलाई , जीने में !
मगर एक मासूम उम्र के,
छिने खिलौने,बचपन में !
इससे बड़ा पाप क्या होगा, बच्चों से छीना संगीत !
असुरक्षा बच्चों को देकर,खूब लडे, अज्ञानी गीत  !

हम तो कभी नहीं हँस पाए ,
विधि ने ही कुछ पाठ पढाये !
बच्चों का न , साथ दे पाए ,
इक दूजे को,सबक सिखाये !
पाठ पढ़ाया किसने,किसको,वाह वाह करते हैं गीत  ?
अपने हाथों शाख काट के,कालिदास, रचते हैं गीत  ? 

अभी समय है,चलो हंसाएं 
हम अपनी, मुस्कानों को 
तुम आँचल की छाया दे दो
मैं कुछ लाऊँ, भोजन को !
नित्य रोज घर उजड़े देखें , तड़प तड़प, रह जाए प्रीत !
इतना दर्द, सुनाऊं किसको ,कौन समझता, मेरे गीत !

एक बार देखो , दर्पण में ,
खुद से ही कुछ बात करो
जीवन भर का लेखा जोखा
जोड़ के , सारी बात करो !
खाना पीना और सो जाना,जीवन से यह कैसी प्रीत ?
मरते दम तक, साथ निभाएं,कहाँ से लायें ऐसे मीत  ?

विश्वविजय का निश्चय करके,निकले दिल से मेरे गीत

जब भी कभी घोंसला नोचा,
अपने ही घर  वालों   ने  !
तब तब आश्रय दिया मुझे
कुछ, हंसों के दरवाजे ने  !
चूजों  तक ने सेवा की थी,जब मुरझाये थे ये गीत !
कभी न, वे दिन भुला सकेंगे, आभारी हैं मेरे गीत ! 

याद खूब अपमान, अश्रु का
जिसे देख,कुछ लोग हँसे थे
सिर्फ तुम्हारी ही आँखों से ,
दो दो आंसू , साथ बहे थे  !
उन्ही दिनों लेखनी उठी थी,अश्रु पोंछ कर,लिखने गीत !
विश्वविजय का निश्चय करके,निकले दिल से मेरे गीत !

दावानल के समय हमेशा
रिमझिम वारिश होती है !
जलती लपटों के समीप
जल भरी गुफाएं होती हैं !
शीतल आश्रय आगे आते, जब जब, झुलसे मेरे गीत !
चन्दन लेप लगा ममता ने, खूब सुलाए, घायल गीत ! 

हर खतरे में साथ रहे थे,
हर आंसू के साथ बहे थे
जब भी जलते तलुए मेरे
तुमने अपने हाथ रखे थे !
ऐसे प्यारों के कारण ही , जीवन में लगता संगीत !
इनकी धीमी सी आहट से ,निर्झर झरते मेरे गीत ! 

धोखे की इस दुनियां में ,
कुछ प्यारे बन्दे रहते हैं !
ऊपर से साधारण लगते
कुछ दिलवाले, रहते हैं !
दोनों हाथ सहारा देते , जब भी ज़ख़्मी , देखे गीत !
अगर न ऐसे कंधे मिलते, कहाँ सिसकते मेरे गीत ! 

घायल हो हो कर पहचानें , गद्दारों को मेरे गीत -सतीश सक्सेना

कितने लोग मिले जीवन में
जिनके पैर पड़े थे, छाले !
रोते थे हिचकी, ले लेकर
उनको घर में दिए सहारे !
प्यार और अहसान न माने,बड़े लालची थे, वे मीत !
घायल हो हो  कर पहचानें ,गद्दारों को, मेरे गीत !

चंद दिनों में दौलत पाकर

डींग  मारते , भड़क  रहे !
चंद तालियों को सुन कर ,
ही खुद को राजा मान रहे !
प्रजा समझ कर जिसे रुलाया,वही करेगी इनको ठीक !
कुछ वर्षो के बाद,  इन्हीं  पर, खूब  हँसेंगे,  मेरे गीत  !

दम भरते हैं,धर्मराज का

करते काम, कसाई का !
पूरे दिन,मृदु वचन सुनाएँ 
रात को नशा, शराबी का !
कुछ दिन में जनता सीखेगी,ध्यान से पढने मेरे गीत !
बड़ी दुर्दशा, नेता झेलें  , जिस दिन जागें,  मेरे गीत  !

माल कमाने को निकले हैं 

देशभक्ति का झंडा लेकर  
प्रजातंत्र में, नेता निकले 
राजनीति का डंडा लेकर !
खूब बनायें मूर्ख देश को,अनपढ़ प्रजा,सुन रही गीत !
पतन देख कर,राजनीति का,भौचक्के हैं, मेरे  गीत !

चोर उचक्के, रखवालों को
थप्पड़ भरे, बाज़ार मारते !
सच्चे लोगों को, समाज में
जीभर के अपमानित करते
चोरों को अध्यक्ष बनाएँ , सरे आम, पिटते जनगीत !
न्यायाधीश बनाकर इनको, क्यों पछ्ताएं मेरे गीत ?

बहुमत का फायदा उठाते
जमकर गुंडा राज चलाते
वोट दिलाया जिन गुंडों ने
उनके सर पर हाथ फिराते
नफरत और अन्याय देखकर,अक्सर रोये मेरे गीत !
तब तब कलम उठी अंगडाई लेकर,लिखने मेरे गीत !

जबतक जातिवाद पनपेगा
देश को यूँ ही रोना होगा !
जब तक जनता डरी रहेगी
इन लाशों को ढोना होगा !
कब तक जनता पहचानेगी अपनी ताकत अपनी जीत !
धीरे धीरे समझ आ रही , मुखर हो रहे हैं , जनगीत !

बेईमानों के चेहरों की कुछ
कुछ पहचान सामने आयी !
नकली चेहरों की नौटंकी ,
धीरे धीरे समझ तो आयी !
राजनीति ही आसानी से धन दिलवाये समझे गीत !
रंगमंच पर नाटक करते , कैसे प्यार सिखाएं गीत !

अनपढ़ जनता आसानी से
इनके बहकावे में आये !
जाति,धर्म की कसमें खाते
केवल वोट, बटोरें जाएँ !
सदबुद्धि जनता पा जाये,लोकतंत्र की होगी जीत !
सरस्वती की करें वन्दना, चिंतित रहते मेरे गीत !


भुला के वादे,निश्छल दिल से,शर्मिन्दा हैं,मेरे गीत !

पता नहीं,कुल साँसे अपनी
हम  खरीद  कर , लाये हैं !
कल का सूरज नहीं दिखेगा
आज  समझ , ना  पाए हैं !
भरी वेदना, मन में लेकर , कैसे समझ  सकेंगे   प्रीत  ?
मूरखमन फिर चैन न पाए,जीवन भर अकुलायें गीत ! 

जीवन की कुछ भूलें ऐसी ,
याद , आज  भी आती है !
भरी  डबडबाई, वे ऑंखें ,
दिल में कसक जगाती हैं !
जीवन भर के बड़े वायदे , सपने खूब दिखाए मीत !
भुला के वादे,निश्छल दिल से,शर्मिन्दा हैं,मेरे गीत ! 

याद  रहे , वे निर्मल सपने,
कुछ अपने से,कुछ गैरों से 
दिवा स्वप्न जो हमने देखे
बिखर गए, भंगुर शीशे से 
जीवन भर के कसम वायदे, नहीं निभा पाए थे गीत !
अब क्यों यादे, उनकी आयें, क्यों पछताएं मेरे गीत ?

बड़े दिनों से बोझिल मन है 
कर्जा चढ़ा,   संगिनी का !
चलते थे अपराध बोध ले 
मन में क़र्ज़ ,मानिनी का !
दारुण दुःख में साथ निभाएं, कहाँ आज हैं,ऐसे मीत !
प्यार के करजे उतर न पायें ,खूब जानते मेरे गीत ! 

जीवन की कडवी यादों को
भावुक मन से भूले कौन ?
जीवन के प्यारे रिश्तों मे
पड़ी गाँठ, सुलझाए कौन ?
गाँठ पड़ी है,कसक रहेगी,हर दम चुभता रहता तीर !
जानबूझ कर,धोखे देकर, कैसे नज़र झुकाते, गीत ? 
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